हिमालय की चार धाम यात्रा –प्रकृति,वैराग्य और
आत्मिक सुख का समन्वय
-डॉ अनिल कुमार शर्मा,
हिमालय की चार धाम यात्रा प्रकृति के पास जाने ,उसे
समझने और आत्मिक सुख पाने का साधन है ,अभी हाल में हमने चार धाम जाने का मन बनाया ,८
वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने भारत के चार दिशाओं के महत्वपूर्ण मंदिरों कों
राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए एक सूत्र में पिरोया था ये मंदिर हैं-पूर्व में पुरी, दक्षिण
में रामेश्वरम, पश्चिम
में द्वारिका और उत्तर में बद्रीनाथ,जिनको चार धाम कहा जाता है | इसके अतिरिक्त
हिमालय पर स्थित छोटा चार धाम में बद्रीनाथ के अलावा केदारनाथ (शिव मंदिर), यमुनोत्री एवं गंगोत्री (देवी मंदिर) शमिल
हैं। यह चारों धाम हिंदू धर्म में अपना अलग और महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
बीसवीं शताब्दी के मध्य में हिमालय की गोद में बसे इन चारों तीर्थस्थलों को “छोटा' विशेषण दिया गया जो बाद में हटा
दिया गया और इस यात्रा को 'हिमालय की चार धाम' यात्रा के नाम से जाना जाने लगा ।
चीन के साथ हुए युद्ध के
पहले १९६२ तक यहां की यात्रा करना काफी कठिन थी,पर ज्यों-ज्यों सैनिकों की
आवाजाही बढ़ी वैसे ही तीर्थयात्रियों के लिए रास्ते भी आसान होते गए। आवागमन के साधनों
में सुधार होने के साथ ही ये धाम पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों के लिए प्रमुख
तीर्थस्थल बन गये है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा पर्यटकों, तीर्थयात्रियों
की सालाना तादाद से लगाया जा सकता है। प्रत्येक वर्ष यात्रा के समय (15 अप्रैल से नवंबर के प्रारंभ तक) में ३ लाख से अधिक तीर्थयात्री यहां
दर्शन हेतु आते हैं। मानसून आने के दो सप्ताह पहले तक पयर्टकों, तीर्थयात्रियों का जबर्दस्त प्रवाह रहता है। वर्षा ऋतू में यहां जाना
खतरनाक माना जाता है, क्योंकि इस दौरान भूस्खलन की संभावना
बढ़ जाती है,वैसे भी प्रकृति के साथ इतना छेड़छाड़ आने वाले
दिनों में खतरे की घंटी तो है ही ।
भारतीय धर्मग्रंथों के
अनुसार यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ हिंदुओं के सबसे
पवित्र स्थान हैं। इनको चार धाम के नाम से भी जाना जाता हैं। धर्मग्रंथों में कहा
गया है कि जो पुण्यात्मा यहां का दर्शन करने में सफल होते हैं उनका न केवल इस
जनम का पाप धुल जाता है वरन वे जीवन-मरण के बंधन से भी मुक्त हो जाते हैं। इस स्थान
के संबंध में यह भी कहा जाता है कि यह वही स्थल है जहां पृथ्वी और स्वर्ग
एकाकार होते हैंऔर जब आप कभी यात्रा करेंगे ,आपको इसका आभास होगा । तीर्थयात्री इस
यात्रा के दौरान सबसे पहले यमुनोत्री (यमुना) और गंगोत्री (गंगा) का दर्शन करते
हैं। यहां से पवित्र जल लेकर श्रद्धालु केदारेश्वर पर जलाभिषेक करते हैं। इन
तीर्थयात्रियों के लिए परंपरागत मार्ग इस प्रकार है -:
हरिद्वार
–ऋषिकेश –देवप्रयाग –टिहरी-धरासु-यमुनोत्री –उत्तरकाशी –गंगोत्री
–त्रियुगनारायण-गौरीकुंड-केदारनाथ –बद्रीनाथ
यह मार्ग
परंपरागत हिंदू धर्म में होनेवाले पवित्र परिक्रमा के समान है। जबकि केदारनाथ जाने
के लिए दूसरा मार्ग ऋषिकेश से होते हुए देवप्रयाग, श्रीनगर,
रूद्रप्रयाग, अगस्तमुनी, गुप्तकाशी और गौरिकुंड से होकर जाता है
और प्रारंभ
हुई हमारी यात्रा ...
पहला पड़ाव रहा
हरिद्वार –हरी का द्वार ,भगवान का द्वार-वैष्णव इसको हरी अर्थात विष्णु का द्वार
कहते है और शैव हर अर्थात शिव का द्वार |शाम के समय ब्रह्म कुंड में गंगा स्नान के
पश्चात गंगा आरती देखना एक स्वर्गिक अनुभव है जिसको शब्दों में कहना असंभव है
,आरती के समय रात्रि में गंगा में बहते दीपक और आरती के बड़े दीपक मिलकर एक
अवर्णनीय दृश्य उत्पन्न करते है ,सदियों से सलिल श्यामला गंगा धरती पर हम मनुष्यों
के पापों कों धोती आई है और युगों तक धोती रहेगी |शायद प्रदूषण सबसे बड़ा पाप
है जो मानव जाति ने किया है ओर जिससे आज
गंगा जूझ रही है अपने अस्तित्व के लिए ,पोलिथिन एवं गंगा के किनारे बसे शहरों का
कचरा ढोते- ढोते जैसे गंगा किसी चमत्कार की आस लगाये बह रही है|हमारी सोच और कर्म के कारण महत्वपूर्ण नदियां मृतप्राय हो गई है,ईश्वर
से प्रार्थना और सबसे अनुरोध है कि पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों कों समझे और
गंगा बचाएं |
दूसरा दिन -हरिद्वार
में रात्रि विश्राम के पश्चात सुबह नाश्ता कर हम आगे चले ,ऋषिकेश-चार धाम जाने के
लिए पंजीकरण करने का स्थान और लक्ष्मण झूला ,गीता भवन ,शिवानंद झूला आदि के लिए
प्रसिद्द ,पर हम ऋषिकेश केवल पंजीकरण के लिए रुके और आगे बढे ,देहरादून होते हुए
मसूरी की ओर,रास्ते में देखा स्वार्थी तत्वों द्वारा पहाडो का खनन ,पहले चूने के
पत्थरों के लिए,फिर मकानों के लिए |लगभग तीस साल पहले जब मै देहरादून में पढता था
तो इन् पहाडो से मेरा करीब का नाता था में वनस्पति विज्ञान का विद्यार्थी रहा हू
ओर इसलिए पेड-पोधो के नाम जानने के लिए लगातार आता जाता रहा ,तब इतने मकान भी नहीं
थे ओर इतना खनन भी नहीं हुआ था –आज समय बदल गया है ,मई के अंत में पर्वतो की रानी मसूरी किसी सामान्य से शहर की तरह ही लगी ,गर्म,
शायद बढते मकानों के कारण या बढते वाहनों के कारण ,आगे बढते समय केम्पटी फाल मिला
,हलाकि पहले से कम पानी हो गया है फिर भी देखकर राहत हुई,ऊँचाई से गिरता पानी ओर
नीचे गिरते समय झाग बन जाना आज भी कमोवेश वैसा ही है |सुबह ८ बजे हरिद्वार से चल
कर हम शाम ६ बजे बरकोट पहुचे ,बरकोट अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है यहाँ से बर्फ से ढकी
हिमालय की चोटिया “बंदर पूंछ” दिखाई देती है ,रात्रि विश्राम के लिए यह स्थान सबसे
रमणीक लगा ओर हमने केम्प में रात्रि शयन किया एवं प्रातः उठकर उगते सूर्य के दर्शन
किये ,उगते सूर्य की किरणे पड़ते ही जैसे बर्फ से तरह तरह के रंग दिखाए देने लगे |
तीसरा दिन-अब हमारा
गंतव्य था यमुनोत्री जोकि बरकोट से केवल ४० किमी० दूर था ओर उसके बाद ६ किमी०
की चढाई ,बरकोट से सयाना चट्टी होते हुए जानकीचट्टी पहुचे, परंपरागत रूप से यमुनोत्री चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है।
जानकी चट्टी से लगभग 6 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने के बाद यमुनोत्री पहुंचा जा सकता
हैजिसमे ३ किलोमीटर की चढाई तो दुर्गम है पर रास्ते के प्राकर्तिक दृश्यों कों
देखकर सारी थकान मिट जाती है ,यात्रियो की सुविधा के लिए कंडी,डोली और टट्टुओ का
भी प्रबंध है , अधिकतर लोग इसका फायदा उठाते है,पर पहले मोल भाव जरुरी है नहीं तो
आपको परेशानी होगी । यमुना का उदगम स्थल यमुनोत्री से लगभग एक किलोमीटर दूर 4,421 मीटर की ऊंचाई पर स्थित
यमुनोत्री ग्लेशियर है। मंदिर के दर्शन करते ही अलोकिक सुख की प्राप्ति होती है यमुना
मंदिर का निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं शताब्दी में करवाया था। यह मंदिर(3,291 मी.) बंदरपूंछ चोटी (6,315 मी.) के पश्चिमी किनारे पर
स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यमुना सूर्य की बेटी थी और यम की बहन । इसी
कारण यम अपनी बहन यमुना में श्रद्धापूर्वक स्नान किए हुए लोगों के साथ सख्ती
नहीं बरतता ।यमुनोत्री मंदिर के समीप कई गर्म पानी के स्त्रोत हैं ,इनमें से सूर्य
कुंड प्रसिद्ध है। कहा जाता है बेटी को आर्शीवाद देने के लिए भगवान सूर्य ने गर्म
जलधारा का रूप धारण किया। श्रद्धालु इसी कुंड में चावल और आलू कपड़े में बांधकर
कुछ मिनट तक छोड़ देते हैं, जिससे ये पक जाते
है। तीर्थयात्री इन पके हुए खाद्यान्न को
प्रसादस्वरूप घर ले जाते हैं। सूर्य कुंड के नजदीक ही 'दिव्य शिला' है यमुना जी की पूजा करने
से पहले इस दिव्य शिला का पूजन किया जाता हैं।इसके नजदीक ही 'जमुना बाई कुंड' है, जिसका निर्माण आज से कोई सौ
साल पहले हुआ । इस कुंड का पानी हल्का गर्म होता है जिसमें पूजा के पहले पवित्र
स्नान किया जाता है। यमुनोत्री मंदिर
नवंबर से मई तक खराब मौसम की वजह से बंद रहता है। मंदिर अक्षय तृतीया (मई) को
खुलता है और यम द्वितीया या भाई दूज या दीवाली के दो दिन बाद बंद होता है |यमुनोत्री के
दर्शन के बाद हम बारकोट वापस आ गए |
चौथा दिन- बरकोट से
हरसिल,दूरी १५० किमी ,गाडी से समय लगा ८ घंटे , सुबह नाश्ते के पश्चात हम चले
हरसिल ,दुनिया की सबसे खुबसूरत घाटियों में से एक ,इसके सुन्दर ओर रोमांचकारी
नजारो से आप बच नहीं पायेगे और अगर आप फोटो के शोकीन है तो कम से कम १० घंटे तो
लगेगे ही ,प्रकृति की छठा को निहारते हुए हम उत्तरकाशी पहुंचे ,जहां विश्वनाथ
मंदिर के दर्शन किये|आगे चल कर गंगनानी पहुंचे जहां गर्म पानी में स्नान किया
,थकान मिटाई और मुख्य सड़क से लगभग १५० मीटर चल कर पर्केटेश्वर मंदिर देखा ,यह
मंदिर
एक प्राक्रतिक गुफा
में बना है और रमणीक स्थान है |गंगा के साथ साथ चलना और उसको देखना भी एक
रोमांचकारी अनुभव रहा ओर समय से हरसिल पहुंचे जहां रात्रि विश्राम किया और ऊर्जा
का संचयन किया
पांचवा दिन- हरसिल से गंगोत्री और वापस उत्तरकाशी,दूरी १०५ किमी ,समय ५ घंटे
,गंगोत्री पहुँचने पर गंगा स्नान किया,पूजा की और गंगाजल एक बोतल में भर लिया
,गंगा की ताज़ी हवा और पवित्र एवं सुरम्य वातावरण से थकान मिट गयी |इश्वर को
धन्यवाद दिया कि गंगोत्री में माँ गंगा के दर्शन किये, गंगोत्री की महिमा का क्या
कहनाअगर आप प्रकृति प्रेमी है और चल सकते है तो गौमुख अवश्य जाइए
,बस पास में, ही है
समुद्र तल से 9,980 फीट की
ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री से भागीरथी नदी निकलती है। गंगोत्री में गंगा को भागीरथी
के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा भागीरथ के नाम पर इस नदी का
नाम भागीरथी रखा गया। कथाओं में यह भी कहा गया है कि राजा भागीरथ ही तपस्या करके
गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। गंगा नदी गोमुख से निकलती है।पौराणिक कथाओं में कहा
गया है कि सूर्यवंशी राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। इनका घोड़ा जहां-जहां गया,
उनके 60,000 बेटों ने उन जगहों को अपने आधिपत्य में ले लिया
। इससे देवताओं के राजा इंद्र चिंतित हो गए। उन्होंने इस घोड़े को पकड़कर कपिल
मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर के बेटे मुनिवर का अनादर करते हुए घोड़े को
छुड़ा ले गए। इससे कपिल मुनि को काफी दुख पहुंचा। उन्होंने राजा सगर के सभी बेटों
को शाप दे दिया और वे राख हो गए। राजा सगर के क्षमा याचना करने पर कपिल मुनि
द्रवित हुए और उन्होंने राजा सगर को कहा कि अगर स्वर्ग में प्रवाहित होने वाली
नदी गंगा पृथ्वी पर जाए और उसके पावन जल का स्पर्श इस राख से हो तो उनके पुत्र
जीवित हो जाएगे । लेकिन राजा सगर गंगा को जमीन पर लाने में असफल रहे। बाद में राजा
सगर के पुत्र भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफलता प्राप्त
की। गंगा के तेज प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए भागीरथ ने भगवान शिव से निवेदन
किया। फलत: भगवान शिव ने गंगा को अपने जटा में लेकर उसके प्रवाह को नियंत्रित
किया। इसके उपरांत गंगा जल के स्पर्श से राजा सगर के पुत्र जीवित हुए। ऐसा माना
जाता है कि 18वीं शदी में गोरखा कैप्टन अमर सिंह थापा ने
आदि शंकराचार्य के सम्मान में गंगोत्री मंदिर का निर्माण किया था। यह मंदिर
भागीरथी नदी के बाएं किनारे पर स्थित सफेद पत्थरों से निर्मित है। इसकी ऊंचाई
लगभग 20 फीट है। मंदिर बनने के बाद राजा माधोसिंह ने 1935 में इस मंदिर का पुनरुद्धार किया। फलस्वरूप मंदिर की बनावट में राजस्थानी
शैली की झलक मिल जाती है। मंदिर के समीप 'भागीरथ शिला'
है जिसपर बैठकर उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या
की थी। इस मंदिर में देवी गंगा के अलावा यमुना, भगवान शिव,
देवी सरस्वती, अन्नपुर्णा और महादुर्गा की
भी पूजा की जाती है।
हिंदू धर्म में गंगोत्री को
मोक्षप्रदायनी माना गया है। यही वजह है कि हिंदू धर्म के लोग चंद्र पंचांग के
अनुसार अपने पुर्वजों का श्राद्ध और पिण्ड दान करते हैं। मंदिर में प्रार्थना और
पूजा आदि करने के बाद श्रद्धालु भगीरथी नदी के किनारे बने घाटों पर स्नान आदि के
लिए जाते हैं। तीर्थयात्री भागीरथी नदी के पवित्र जल को अपने साथ घर ले जाते हैं।
इस जल को पवित्र माना जाता है तथा शुभ कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है।
गंगोत्री से लिया गया गंगा जल केदारनाथ और रामेश्वरम के मंदिरों में भी अर्पित किया
जाता है।मंदिर अक्षय तृतीया (मई) को खुलता है और यम द्वितीया को बंद होता है। तीर्थयात्री प्राय: गनगनानी के रास्ते
गंगोत्री जाते हैं। यह वही मार्ग है जिसपर पाराशर मुनि का आश्रम था जहां वे गर्म
पानी के स्त्रोत में स्नान करते थे। गंगा के पृथ्वी आगमन पर (गंगा सप्तमी)
वैसाख(अप्रैल) में विशेष श्रृंगार का आयोजन किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार
जिस दिन भगवान शिव ने भागीरथी नदी को भागीरथ को प्रस्तुत किया था उस दिन को (ज्येष्ठ,
मई) गंगा दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। वापस हरसिल आकर
मध्यान्ह भोजन किया और मनेरी के लिए चल
दिए
छठा दिन –केवल चलने के नाम छोटी गाडियों के लिए तरकाशी से
गुप्तकाशीउ, की दूरी २१२ किलोमीटर है और रास्ता है - चोरंगिखाल –लुम्ब गांव –पीपलडाली –कीर्तिनगर –श्रीनगर-रुद्रप्रयाग-अगस्तमुनि –चंद्रावली-गुप्तकाशी बड़ी गाडिया चम्बा
होकर जाती है जो लगभग २८० किलोमीटर दूर है ,चलते चलते गंगा के किनारे बसे नगरों के बारे में,वहा की सभ्यता ओर संस्कृति के
बारे में देखना और जानने का अनुभव भी दिलचस्प रहा |
सातवाँ दिन –महत्वपूर्ण
दिन,गुप्तकाशी से केदारनाथ –गुप्तकाशी से गौरीकुंड जाते है और वहाँ तप्तकुंड में
स्नान कर केदारनाथ का ट्रेक प्रारंभ होता है,यह १४ किलोमीटर का ट्रेक है पर
यमुनोत्री से आसान ,कुछ लोग हेलिकॉप्टर से भी केदारनाथ जाते है जो गुप्तकाशी एवं
फाटा से उपलब्ध है ,चाहे कैसे भी जाए ,प्रकृति कों देखकर लगेगा कि स्वर्ग यही है केदारनाथ
समुद्र तल से 11,746 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदाकिनी नदी के उद्गम स्थल के समीप है।
यमुनोत्री से केदारनाथ के ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक को हिंदू धर्म में पवित्र
माना जाता है। वायुपुराण के अनुसार भगवान विष्णु मानव जाति की भलाई के लिए पृथ्वी
पर निवास करने आए। उन्होंने बद्रीनाथ में अपना पहला कदम रखा। इस जगह पर पहले
भगवान शिव का निवास था। लेकिन उन्होंने नारायण के लिए इस स्थान का त्याग कर
दिया और केदारनाथ में निवास करने लगे।इसकी रोचक कथा है |भगवान विष्णु ने एक शिशु
का रूप धारण किया और शंकर भगवान की कुटिया के बाहर जोर जोर से रोने लगे,उस समय
शंकर पार्वती स्नान के लिए जा रहे थे देवी
पार्वती कों ये देखा ना गया उन्होंने भगवान से शिशु कों कुटिया में रखने की अनुमति
मांगी,शंकर भगवान त्रिकाल दर्शी थे ,तुरन्त समझ गये और पार्वती से कहा कि इस शिशु
के चक्कर में मत पडो,पर पार्वती ने जिद पकड़ ली और शिशु कों उठा कर कुटिया में लिटा
दिया ,लौट कर आये तो विष्णु भगवान ने कुटिया का दरवाजा बंद कर लिया और भगवान शंकर
कों मजबूरन केदारनाथ आना पड़ा | यात्रा में केदारनाथ को अहम स्थान प्राप्त है
क्योकि केदारनाथ त्याग का प्रतीक है |यह वही जगह है जहां आदि शंकराचार्य 32 वर्ष की आयु में समाधि में लीन हुए थे। इससे पहले उन्होंने वीर शैव को
केदारनाथ का रावल(मुख्य पुरोहित) नियुक्त किया था। वर्तमान में केदारनाथ मंदिर 337वें नंबर के रावल द्वारा उखीमठ (जहां जाड़ों में भगवान शिव को ले जाया
जाता है) से संचालित हो रहा है। इसके अलावा गुप्तकाशी के आसपास निवास करनेवाले
पंडित भी इस मंदिर के काम-काज को देखते हैं। केदारनाथ मंदिर न केवल आध्यात्म के
दृष्टिकोण से वरन स्थापत्य कला में भी अन्य मंदिरों से भिन्न है। यह मंदिर
कात्युरी शैली में बना हुआ है। यह पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। इसके निर्माण में
भूरे रंग के बड़े पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इसकी छत लकड़ी की है जिसके शिखर
पर सोने का कलश रखा हुआ है। मंदिर के बाह्य द्वार पर पहरेदार के रूप में नंदी का
विशालकाय मूर्ति है।
केदारनाथ मंदिर को तीन भागों
में बांटा गया है - पहला, गर्भगृह; दूसरा, दर्शन मंडप ;, तीसरा, सभा मण्डप |गर्भ गृह में भगवान की शिला रूप
में पूजा होती है और कोई मूर्ति नहीं है |इसकी एक रोचक कथा है -महाभारत
के पश्चात पांडव कुल ह्त्या और ब्रह्म ह्त्या से मुक्त होने के लिए भगवान शिव के
दर्शन हेतु यहाँ आये ,शंकर भगवान ने इनको देखकर भैंसे का रूप बना लिया और घास चरने
लगे ,पांडवो ने भगवान कों पहचान लिया और उनकी पूंछ पकड़ ली ,भगवान ने भागते हुये
सिर का हिस्सा बाहर निकाला जो कि पशुपतिनाथ में है और धड का हिस्सा केदार नाथ में रह
गया ,क्योकि पांडवो ने पूंछ पकड़ कर भैंस के धड पर जोर जोर से हाथ मारे थे जिससे
घाव हो गये थे इसीलिए यहाँ माखन और घी या
शहद ,दुग्ध आदि से शिला कों नहलाया जाता है | दर्शन मंडप में दर्शानार्थी एक बड़े से हॉल में खड़े होकर पूजा
करते हैं। सभा मण्डपमें सभी तीर्थयात्री जमा होते हैं। यहां भगवान शिव के अलावा
ऋद्धि सिद्धि के साथ भगवान गणेश, पार्वती, विष्णु और लक्ष्मी, कृष्ण, कुन्ती,द्रौपदी,
युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की पूजा अर्चना भी की जाती है।
केदारनाथ मंदिर के खुलने का
समय निर्धारित नहीं रहता है। हर साल शिवरात्रि पर पंच पुरोहित के द्वारा उखीमठ में
इस बात का फैसला किया जाता है कि मंदिर कब खुलेगा मंदिर यम द्वितीया या भाई दूज के दिन बंद हो
जाता है। जाड़ों में मंदिर का द्वार बंद हो जाने के बाद वहां कोई नहीं रहता है।
पंडा लोग गुप्तकाशी में और रावल उखीमठ में निवास करते हैं|केदारनाथ में विशेष
पूजा का भी आयोजन किया जाता है। यह सुबह चार से छह बजे तक होती है। विशेष पूजा और दर्शन
के पश्चात हम गुप्तकाशी लौट आये
नवां दिन – गुप्तकाशी से
जोशीमठ ,दूरी लगभग १७५ किमी और समय लगा ८ घंटे ,जोशीमठ में रात्रि विश्राम किया
और आगे जाने के लिए ऊर्जा का
संचयन किया |
दसवा दिन-जोशीमठ से बद्रीनाथ
और फिर वापस जोशीमठ (४५ किमी-समय २ घंटे एक तरफ से),जोशीमठ से बद्रीनाथ तक सड़क
मार्ग है और अगर ट्रेफिक जाम न हो तो लगभग २ घंटे ,वरना भगवान् भरोसे , इन चारों
मंदिरों में बद्रीनाथ सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और सबसे अधिक तीर्थयात्रियों
द्वारा दर्शन करने वाला मंदिर है।बद्रीनाथ नर और नारायण पर्वतों के मध्य स्थित है, जो समुद्र तल से 10,276 फीट की ऊंचाई पर स्थित
है। अलकनंदा नदी इस मंदिर की खूबसुरती में चार चांद लगाती है। ऐसी मान्यता है कि
भगवान विष्णु इस स्थान में ध्यानमग्न रहते हैं। लक्ष्मीनारायण को छाया प्रदान
करने के लिए देवी लक्ष्मी ने बेर (बदरी) के पेड़ का रूप धारण किया। लेकिन वर्तमान
में बेर के पेड़ तो बहुत कम दिखाई पड़ते है लेकिन बद्रीनारायण अभी भी ज्यों का त्यों
बना हुआ है। भक्त नारद की आराधना भी यहां की जाती है। मंदिर का निर्माण आज से ठीक
दो शताब्दी पहले गढ़वाल राजा द्वारा किया गया था। यह मंदिर शंकुधारी शैली में बना
हुआ है और इसकी ऊंचाई लगभग 15 मीटर है।
जिसके शिखर पर गुंबज है। इस मंदिर में 15 मूर्तियां हैं। मंदिर के गर्भगृह में विष्णु
के साथ नर और नारायण ध्यान की स्थिति में विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि इस
मंदिर का निर्माण वैदिक काल में हुआ था जिसका पुनरूद्धार बाद में आदि शंकराचार्य
ने 8वीं शदी में किया। इस मंदिर में नर और नारायण के अलावा लक्ष्मी, शिव-पार्वती और गणेश की मूर्ति भी
है।भू-स्खलन के कारण यह मंदिर अक्सर क्षतिग्रस्त हो जाता है। इस वजह से इसका
आधुनिकीकरण भी बार-बार किया जाता रहा है। लेकिन सिंह द्वार (मंदिर का मुख्य द्वार) के बन जाने से इसकी खूबसूरती में चार चांद लग गया है। इस मंदिर
के तीन भाग हैं- गर्भगृह, दर्शन मंडप (पूजा करने का स्थान)
और सभा गृह (जहां श्रद्धालु एकत्रित होते हैं)। वेदों और ग्रंथों में बद्रीनाथ के
संबंध में कहा गया है कि, 'स्वर्ग और पृथ्वी पर अनेक
पवित्र स्थान हैं, लेकिन बद्रीनाथ इन सबों में
सर्वोपरि है।' भगवान् बद्रीविशाल के दर्शन
के बाद ब्रह्मकपाल देखा जहां हिन्दू अपने पूर्वजो का पिंड दान करते है |
बद्रीनाथ से लगभग 3 किमी दूर
है माना गाँव,भारत का आखिरी गाँव ,इस गाँव में इंडो-मंगोलियन जनजाति निवास करती है
और यह तिब्बत से पहले है ,यहाँव्यास गुफा ,प्राकृतिक भीम पुल और वसुंधरा झरना(१२२
मी ऊँचा ) नैसर्गिक आनंद देने वाले रमणीक स्थान है |माना गाँव देखने के बाद हम शाम
वापस जोशीमठ आ गए और रात्रि विश्राम किया |
ग्यारहवा दिन-रहा वापसी का
,यात्रा का आखिरी दिन ,जोशीमठ से हरिद्वार –दूरी २७४ किमी और समय लगभग १० घंटे,शारीर
थका –थका ,पर चित्त प्रसन्न ,रास्ते में देखा प्रकृति का अंधाधुंध दोहन ,जगह –जगह
खनन ,तेजी से गायब होते पहाड़,सूखती धाराए,पहाड़ की संस्कृति को धकेलती मॉल संस्कृति
, गंजे होते पहाड़ (बिना वृक्षों के) रास्ते में बने बाँध और कृत्रिम जल धाराए- देख कर लगता है कि क्या हम यही देखने यहाँ आये
थे |आवश्यकता से अधिक दोहन का परिणाम क्या होगा ?पर सकून मिलता है पञ्च प्रयाग
देखकर ,विभिन्न धाराए इस प्रकार मिलती है जैसे एक दूसरे की प्रतीक्षा कर रही हो ,अलकनंदा और भागीरथी के मिलन से बना नंदप्रयाग
,अलकनंदा और मन्दाकिनी के संयोग से बना रुद्रप्रयाग और अलकनंदा ,मन्दाकिनी और भागीरथी
के मिलन से बना देवप्रयाग, अलकनंदा और पिंडार नदी से मिल कर बना कर्णप्रयाग और
जोशीमठ से बद्रीनाथ वाले रूट पर अलकनंदा और धौलीगंगा से मिल कर बना
विष्णुप्रयाग,यहा नारद जी ने विष्णु भगवान् के लिए तपस्या की थी,पास में ही
नीले-हरे पानी वाली कागभुसंडी झील भी आकर्षण का केंद्र है |धीरे –धीरे हम नीचे आते
चले गए ,गंगा को विभिन्न रूपों में देखा –भयंकर ,विकराल रूप से लेकर इठलाती बलखाती
गंगा और शांत गंभीर माँ स्वरुप गंगा ,किनारे बने सारे नगर और कसबे अपना
अवशिस्ट,कूड़ा कचरा गंगा में डालते है और हम मानते है कि गंगा साफ़ सुथरी रहेगी
,गंगा के नाम पर रोजी-रोटी चलने वाले भी कभी शायद ही इस बारे में सोचते हो |यात्रा
के पश्चात हम वापस आये पर बहुत सारे प्रश्नों के साथ ..क्या नदियों के बारे में
हमारी कोई राष्ट्रीय नीति होनी चाहिए? क्या राष्ट्रीय नदी घोषित करने के पश्चात
गंगा में कोई परिवर्तन आया ,क्या हमारी सभी नदियों का हाल यमुना जैसा होगा ?क्या
कोई राष्ट्रीय नीति पहाडो के बारे में बन पाएगी ?क्या पहाड़ो की संस्कृति और सभ्यता
शहरों की भीड़ में खो जायेगी..आदि आदि ,ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे पहाड़ ,जंगल
,नदिया सुरक्षित रहे और संस्कृति बची रहे, सीधे सरल,ईमानदार पहाड़ के लोग, एवं मेहनतकश
औरते लालच से दूर रहे व यहाँ फलो के उद्यान हरे भरे रहे
_______________________________________________________________________________
*यह लेख उत्तराखंड की भीषण
त्रासदी से पहले लिखा गया था और समर्पित है उनको जिन्होंने इस त्रासदी को जिया और
जो इसके शिकार बने ,उनको जिन्होंने जान पर खेल कर मानवता को बचाया और उन सभी को जो
पुनर्निर्माण में लगे है देवभूमि उत्तराखंड के ..शत शत नमन, प्रत्येक
वर्ष उन्ही की याद में इसीको पढ़ लेता हूँ
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